name="google-site-verification" content="XXXXXX" /> संस्कृत में श्लोक, विद्यामहत्वम् (IMPORTANCE OF KNOWLEDG( येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।).970909622037,8340763695, ARARIA, BIHAR. सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

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क्तिन् प्रत्यय | संस्कृत व्याकरण | उदाहरण एवं 20 महत्वपूर्ण MCQ

क्तिन् प्रत्यय – संस्कृत व्याकरण क्तिन् प्रत्यय संस्कृत व्याकरण में स्त्रीलिङ्गवाचक कृदन्त शब्द बनाने वाला महत्वपूर्ण प्रत्यय है। प्रतियोगी परीक्षाओं तथा विद्यालयी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। क्तिन् प्रत्यय के उदाहरण सृज् + क्तिन् → सृष्टिः कृ + क्तिन् → कृतिः श्रु + क्तिन् → श्रुतिः गम् + क्तिन् → गतिः स्था + क्तिन् → स्थितिः स्मृ + क्तिन् → स्मृतिः मन् + क्तिन् → मतिः मुच् + क्तिन् → मुक्तिः भज् + क्तिन् → भक्तिः विश् + क्तिन् → विशिष्टिः क्तिन् प्रत्यय की पहचान क्तिन् प्रत्यय से बने अधिकांश शब्द ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग होते हैं, जैसे— कृतिः, गतिः, मतिः, स्मृतिः, श्रुतिः, सृष्टिः। क्तिन् प्रत्यय – 20 महत्वपूर्ण MCQ 1. ‘सृष्टिः’ शब्द में कौन-सा प्रत्यय है? (A) क्त (B) क्तवतु (C) क्तिन् (D) शतृ उत्तर: (C) क्तिन् 2. ‘कृतिः’ में कौन-सा प्रत्यय है? (A) क्तिन् (B) तव्यत् (C) ल्यप् (D) तुमुन् उत्तर: (A) क्तिन् 3. ‘गति’ शब्द की प्रत्यय-विग्रह क्या है? (A) गम् + क्त (B) गम् + क्तिन् (C) गम् + तव्यत् (D) गम् + शतृ उत्तर: (B) गम् + क्तिन् 4. ‘स्मृतिः’ का सही प्रत्यय है— (A) क्...

संस्कृत में श्लोक, विद्यामहत्वम् (IMPORTANCE OF KNOWLEDG( येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।).970909622037,8340763695, ARARIA, BIHAR.



मातेवरक्षति पितेन हिते नियुक्ते कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम्।लक्ष्मी तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम् किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ।।१।।






अर्थ:-
विद्या माता की तरह रक्षा करती है ,पिता की तरह भरण पोषण करती है। पत्नी की तरह सुख-दुख में साथ देती है ।धन को देती है, यश को चारों दिशाओं में फैलती है ।इसके द्वारा क्या प्राप्त नहीं किया जा सकता है।विद्या कल्पना  वृक्ष की तरह है ,इसका द्वारा इच्छित  फल प्राप्त कर सकते हैं।







 कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी। प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तधनं स्मृतम् ।।२।।







अर्थ :-
विद्या कामधेनु गाय की तरह है ,विद्या फल देने वाली होती है । यह विदेश में माता की तरह मदद करती है,तथा गुप्त(छुपा हुआ) सदा याद रखने योग्य है।





 न चौरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी। व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनम् सर्वधनं प्रधानम् ॥३॥






अर्थ:-
विद्या रूपी धन को ना चोर चुरा सकता है ,ना राजा हरण कर सकता है । ना भाई बांट सकता है ,इसमें वजन भी नहीं होता है ।विद्या को नित्य रोज खर्च करने पर  बढ़ता है ,जबकि दूसरे धन को रोज खर्च करने पर घटता है, इसी विशेषता के कारण विद्या को सभी धनों में श्रेष्ठ माना गया है।






 अन्नदानं परं दानं विद्यादानं ततः परम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवं च विद्यया ।।४।। 






अर्थ : अन्नदान को बड़ा दान कहा गया है ,लेकिन विद्यादान को उससे भी बड़ा दान कहा गया है ।क्योंकि अन्न दान करने और प्राप्त  करने वाले को कुछ छन तक तृप्ति( संतुष्टि )मिलता है ,जबकि विद्यादान करने वाले और पाने वाले को जीवन भर सुख और शांति प्राप्त होती है।




विद्याधनं श्रेष्ठधनं तन्मूलमितरधनम्। दानेन वर्धते नित्यं न भारायच नीयते ।।५।।





अर्थ :-विद्या रूपी धन को श्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि विद्या से ही सभी प्रकार के धन प्राप्त होते है।अर्थात विद्या सभी धनों के जड़ में छिपा है। विद्या को नित्य खर्च करने पर बढ़ता है ,जबकि दूसरे धनों को नित्य खर्च करने से घटता है ,विद्या को कहीं ले जाने या आने में भार महसूस नहीं होता है ,इसी कारण विद्या को सभी धनों में श्रेष्ठ कहा गया है।

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